शून्य से पूर्णांक की यात्रा ही संघ हैं - राजकुमार मलगाया
POST BY- GRAM TAK NEWS: जब एक यात्रा शुरू होती हैं तो शून्य से प्रारंभ होती हैं जब यात्रा का भाव अनंत हो व उद्देश्य राष्ट्र, समाज संस्कृति के संरक्षण व रक्षा जैसे पवित्र भावों से शुरू हुई यात्रा विजयादशमी पर्व को नागपुर के मोहिते के बाड़े में 1925 में कुछ छोटे छोटे युवाओं में राष्ट्रीय दृष्टिकोण को ध्यान रखकर उन युवाओं के मन में भाव का जागरण कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना पूजनीय डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने की एक ऐसे व्यक्ति जो देश के जाने माने डाक्टरों में से एक थे विदेश से भी उन्हें काफी नौकरी के ऑफर आए। पर उनके मन में राष्ट्र धर्म संस्कृति पर हो रही यातनाओं को देखकर कुछ बड़ा करने का भाव चल रहा था। हिंदू समाज में समरस भाव कैसे आए? ऐसे अनगिनत भाव उनके मन में आ चुके थे। इन सब भाव को लेकर उन्होंने संघ की स्थापना की। संघ कार्य को संपूर्ण देश में कैसे विस्तार किया जाए? इसको लेकर उनकी दूरदर्शिता उनके कार्यों से देखने को मिलती है। बड़ी संख्या में शिक्षा गृहण कर रहे युवाओं के बीच उन्होंने राष्ट्र भाव का जागरण किया। जिसके फलस्वरूप देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचारक व पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को स्थान पर भेजना प्रारंभ हुआ। उस समय देश में अंग्रेजी शासन था। जगह जगह आज़ादी की आवाज उठ रही थी इन सबके बीच विपरीत परिस्थितियो में भी संघ कार्य को गति कैसे देना? प्रचारकों व पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं ने रहने व भोजन की चिंता यह सब चुनौतियों से भरा था पर संघ द्वारा तय योजना अनुसार गृह संपर्क व कार्यकर्ताओं के निर्माण से लेकर संघ के प्रशिक्षण वर्ग यह सब योजनाबद्ध तरीकों से प्रारंभ हो चुके थे। संगठन को विस्तार देने के उद्देश्य से विचार परिवार के अन्य संगठनों की स्थापना की गई। कार्यों का बंटवारा किया गया। केंद्र में संघ को रखकर धर्म शिक्षा व समाज में सीधे तौर पर कैसे पहुंचा जा सके इन सब पर गहन चिंतन करके योजना बनाई गई। परिणाम स्वरूप कार्यों का विस्तार संपूर्ण देश में होने लगा। संघ के प्रथम संघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगवार व द्वितीय सर संघचालक माधवराव सदाशिव गोवलकर ने देश के सभी केंद्रों पर प्रवास कर वहां की संस्कृति व सभ्यताओं को ध्यान में रखकर संगठन को मजबूत आकर देकर खड़ा किया। यह किसी चुनौती से कम नहीं था, पर भाव जब राष्ट्र धर्म संस्कृति के संरक्षण व कल्याण का हो तो ईश्वर भी साथ देता हैं परिणामस्वरूप संपूर्ण देश में संघ सन् 2000 आते आते 30 से अधिक विचार परिवार के संगठनों के साथ खड़ा हो गया। संघ की इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण योगदान संघ की प्रचारक व पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को जाता हैं, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संघ को समर्पित कर दिया व राष्ट्र धर्म संस्कृति व समाज को अपना मानकर कार्य किया व आज भी कर रहे है। इस यात्रा में काफी यातनाएं कार्यकर्ताओं ने झेली। पर कभी उस गति को रुकने नहीं दिया। संपूर्ण देश में विस्तार शाखाओं की संख्या निरंतर बढ़ती गई। वर्ष 2025 तक संघ का शताब्दी वर्ष है। यहां से एक नए युग की शुरुआत कही जा सकती है संघ के वर्तमान सर संघचालक डॉ मोहन राव भागवत द्वारा पंच परिवर्तन की योजना पर कार्य प्रारंभ हो गया है। जिसमें घर घर तक संघ की इस यात्रा को पहुंचाना है। मंडल स्तरों पर हिंदू सम्मेलन के माध्यम से समाज में समरता का भाव लाना व एकात्मकता का भाव जागृत करना है। आज दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन बनकर खड़ा है। दुनिया के 45 से अधिक देशों में संघ की शाखाएं है। जहां कार्य चल रहा है। यह यात्रा लेखन में काफी संक्षिप्त है परंतु इस यात्रा को समझने के लिए आपको संघ की शाखा से जुड़कर संगठन के भाव व उद्देश्य को समझ आएगा। यह यात्रा हमें बताती हैं कि शून्य से पूर्णांक के पीछे कितना त्याग व समर्पण रहा होगा? तब जाकर आज राष्ट्र परम वैभव के शिखर पर जाते हुए हम अपनी आंखों से देख रहे हैं। नमन करता हूं उन सभी प्रचारकों, स्वयंसेवको को जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संघ को समर्पित कर दिया।
लेखक व विचारक: राजकुमार मलगाया (राजा)
स्वतंत्र लेखक, वर्तमान परिदृश्य, खंडवा मध्य प्रदेश.
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